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Tuesday, August 13, 2019

खुदरा निवेशकों के लिए क्या हो एसआईपी रणनीति ?





यूटीआई एमएफ के मैनेजर संजय डोंगरे बताते हैं कि आवंटन कब बढ़ाया जाए।घरेलू और वैश्विक कारकों को देखते हुए शेयर बाजार अक्सर दबाव में रहता है। दुनियाभर में आर्थिक मंदी, वैश्विक तौर पर चौतरफा रिटर्न में गिरावट, राजकोषीय मुद्दे और भू-राजनीतिक तनाव- निवेशकों के सामने ऐसी अनेक चुनौतियां हैं। यूटीआई एएमसी के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसीडेंट और सीनियर फंड मैनेजर संजय डोंगरे का कहना है कि 11000 के मौजूदा निफ्टी स्तर पर बाजार एक साल पहले की तुलना में 17 गुना आगे है और जहां तक कमाई का सवाल है, तो यह पिछले 5 वर्षों के औसत मूल्यांकन से थोड़ा अधिक है।

शेयर बाजार पर निकट अवधि का दृष्टिकोण
लघु अवधि में भारतीय बाजारों को कई चुनौतियों का सामना करना पडता है। वैश्विक आर्थिक विकास धीमा हो रहा है, क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध की छाया अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी नजर आ रही है, जहां राजकोषीय प्रोत्साहन के घटते प्रभाव के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था में वृद्धि बहुत धीमे हो रही है। केंद्रीय बैंकों पर मुद्रास्फीति की चिंता हावी है और इस फेर में विकास की चिंता पीछे धकेल दी गई है और दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इसी राह पर चल रहे हैं। बाजारों में रिटर्न बहुत कम रह गया है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता हो सकती है। यह बदले में करेंसी को प्रभावित कर सकता है।

पहली तिमाही, कमाई का सीजन
अब तक वित्तीय वर्ष 20 की पहली तिमाही के लिए कमाई की जो रिपोर्ट आई है, वह बाजार की उम्मीदों से कम रही है। उपभोग में कमी का असर व्यापक अर्थव्यवस्था में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। ऑटो सेक्टर को चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना करना पड़ रहा है, बिक्री में लगातार गिरावट हो रही है और सप्लाई चेन में इन्वेंट्री में निरंतर बढोतरी का दौर चल रहा है और जाहिर है कि इससे कंपनियां परेशान हैं।  आईटी सेक्टर में हालांकि माहौल उत्साहजनक बना हुआ है, लेकिन तिमाही आय में मार्जिन का दबाव साफ दिखाई दे रहा है। हालांकि उपभोक्ता कंपनियों द्वारा बताई गई खपत की मात्रा में वृद्धि स्थिर रही है, लेकिन भविष्य की मांग को लेकर उनकी उम्मीदें, विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उभर रहे तनाव के कारण कमजोरी का संकेत देती है। निजी बैंकों के परिणाम कॉर्पोरेट ऋण वृद्धि में मॉडरेशन को इंगित करते हैं। लेकिन खुदरा विकास मजबूत बना हुआ है। क्रेडिट की लागत के साथ परिसंपत्ति की गुणवत्ता के रुझान को मिलाया गया है जो अभी भी उच्च बना हुआ है।

इक्विटी म्युचुअल फंड इनफ्लो में रुझान
इतिहास गवाह है कि खुदरा निवेशक तब उत्साहित होते हैं, जब बाजार मूल्यांकन के उच्च स्तर तक पहुंच जाता हैं और जब भी बाजार में बड़ी गिरावट आती है, या बाजार औसत मूल्यांकन से कम पर बोली लगाता है, तो वे बाजार से दूरी बना लेते हैं। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। पिछले 20 वर्षों में बाजार में वृद्धि और गिरावट के बाद अब भारतीय खुदरा निवेशकों ने परिपक्वता का परिचय दिया है। भारतीय खुदरा निवेशकों को यह बात समझ में आ गई है कि एक परिसंपत्ति वर्ग के रूप में इक्विटी लंबी अवधि में किसी भी अन्य परिसंपत्ति वर्ग की तुलना में अधिक रिटर्न देता है। भारतीय खुदरा निवेशक ने वारेन बफेट के प्रिंसिपल को अब हकीकत में समझ लिया है कि ‘जब दूसरे लालची बनें, तो भयभीत होने की जरूरत है और जब दूसरे भयभीत हों, तो आप लालची बनें।‘ इसलिए कमजोर बाजार में भी खुदरा निवेशकों की आमद का उछाल सबसे अच्छी बात है जो पिछले तीन वर्षों में भारतीय शेयर बाजार को हुई है। हम भारतीय निवेशकों की निरंतर आमद को देख सकते हैं।




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