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Monday, September 9, 2019

आरएस इंडिया ने स्थापित किया 994 किलोवॉट पीक क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्र

RS India steps forward for environment; installs solar power plant with 994kwp capacity


जयपुर। राजेंद्र और उर्सूला जोशी (आरयूजे) ग्रुप की कंपनी आरएस इंडिया ने महिंद्रा सेज, जयपुर में अपनी फैक्टरी में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया है। आरएस इंडिया में स्थापित इस संयंत्र की क्षमता 994 किलोवॉट पीक है और यह हर महीने 87,000 केडब्ल्यूएच से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करेगा। इस संयंत्र से उत्पन्न बिजली का इस्तेमाल आरएस इंडिया के सभी विभागों में किया जाएगा। सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना दो चरणों में की गई है। 628 किलोवॉट पीक के पहले चरण में 3,94,00,000 रुपए की लागत आई, जबकि 367 किलोवॉट पीक के दूसरे चरण की स्थापना में 1,81,00,000 रुपए व्यय हुए हैं।

आरएस इंडिया के एमडी  जयंत जोशी कहते हैं, ‘‘ सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना पर्यावरण की रक्षा की दिशा में उठाया गया एक छोटा-सा कदम है। हम सब जानते हैं कि औद्योगिक अपशिष्ट पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और हमारा मानना है कि मौजूदा दौर में यही वो समय है, जब सभी उद्योगों को पर्यावरण की रक्षा करने और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अपनी भूमिका निभाने का प्रयास करना चाहिए। आनाकानी करने के बजाय, कंपनियों को कदम उठाना चाहिए और उपाय करना शुरू करना चाहिए, हम तेजी से खतरे की तरफ बढ रहे हैं। बिजली की बर्बादी को बचाने और प्राकृतिक तरीके से बिजली बनाने के लिए आरएस इंडिया ने अपनी फैक्टरी में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया है। हम जो बिजली बचा रहे हैं, उसे हमने हमने राजस्थान सरकार को भी मुहैया कराना शुरू कर दिया है।‘‘

अनुमान है कि आरएस इंडिया के सौर ऊर्जा संयंत्र से हर महीने 6 लाख रुपए से अधिक की बिजली बचाई जाएगी। इतना ही नहीं, आरएस इंडिया ने जुलाई महीने में राजस्थान सरकार को 5346 केडब्ल्यूएच बिजली उपलब्ध कराई, जिसका मूल्य लगभग 39,000 रुपए है। आरएस इंडिया का लक्ष्य बिजली के अपव्यय को रोकना और सौर पैनलों के साथ अपने कारखाने के लिए बिजली पैदा करना है।

जलवायु परिवर्तन हाल ही में एक बड़ा मुद्दा बन गया है, और दुनिया भर में हर कोई किसी भी तरह के ऐसे अपव्यय को रोकने के लिए उपाय कर रहा है, जिससे हालत और खराब हो सकती है। पर्यावरणीय संकट के हालिया उदाहरणों में अमेजॅन फॉरेस्ट का जलना, ग्लेशियरों का पिघलना और अलास्का की समुद्री बर्फ का पहली बार पूरी तरह से पिघलना शामिल है। लोग प्लास्टिक के उपयोग से बचने के जतन कर रहे हैं, भोजन की बर्बादी को रोकने का प्रयास कर रहे हैं और रीसाइकल की जाने योग्य वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि, पर्यावरणीय क्षति के लिए सबसे बड़ा दोषी उद्योगों को माना जाता है। उद्योग खतरनाक गैसों और धुएं का उत्सर्जन करते हैं जो वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं, साथ ही कारखानों से निकलने वाले कचरे को नदियों और महासागरों में छोड दिया जाता है, जिससे जल प्रदूषण का खतरा और बढ जाता है। धरती को पर्यावरणीय संकट की ओर धकेलने के लिए सभी बड़े कॉर्पोरेशन्स को दोषी ठहराया जा रहा है। आपातकाल को ध्यान में रखते हुए, कई उद्योगों ने अब अपनी तरफ से हरसंभव तरीके से प्रदूषण की रोकथाम करने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं।


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