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Wednesday, August 21, 2019

फार्मिंग 3.0 - माइक्रो-इरिगेशन के जरिए पूरा हो सकता है टिकाऊ कृषि का सपना


Mahindra Agri - Farming 3.0 Article (Farming 3.0 - Making Agriculture Sustainable through Micro-Irrigation)

भारत में जल संसाधन सीमित है। जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान दर और उपयोग की प्रवृत्तियों के आधार पर, वर्ष 2050 के आते-आते भारत को जलसंकट से जूझना पड़ सकता है। इसका अर्थ है कि यदि संकट की यह भविष्यवाणी सच होती है, तो एक वर्ष में एक व्यक्ति के लिए 1000 क्यूबिक मीटर से भी कम पानी उपलब्ध होगा।
पानी की यह कमी सामान्य रूप से समूची मानव-जाति के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। वर्तमान में, यह कृषि पर निर्भर मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों के लिए अधिक गंभीर एवं तत्कालिक खतरा बन गया है।
खेती के लिए पानी एक मूल आवश्यकता है। भारत के कुल नवीकरणीय जल संसाधनों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र में प्रयोग हो जाता है। इसका अर्थ है कि इसकी सिंचाई आवश्यकताओं के मद्देनजर, पानी की कमी का सबसे बुरा प्रभाव किसानों पर पड़ेगा। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 15 प्रतिशत है और यह देश की लगभग दो-तिहाई आबादी के लिए आजीविका प्रदान करता है। सिंचाई की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने वाले पानी पर संकट पैदा होने की स्थिति में, इसका परिणाम काफी भयावह और दूरगामी होगा।
मराठवाड़ा महज एक ऐसा उदाहरण है जो दस्तावेजों में दर्ज है। ऐसे कई अन्य क्षेत्र हैं, जहां की मिट्टी कभी फसलों के लिए काफी उपजाऊ हुआ करती थी, आज वहां सूखे का खतरा मंडरा रहा है। बढ़ती आबादी और परिणामस्वरूप अधिक खाद्यान्न पैदा करने की आवश्यकता के चलते जल संसाधन और अधिक घट रहे हैं।
यह एक खतरनाक चक्र है और जल संरक्षण एवं प्रबंधन के जरिए कृषि को इस चक्र से बाहर निकालना अत्यावश्यक है। लेकिन जल संरक्षण और पानी का अत्यधिक उपयोग वाली कृषि पद्धति के बीच संतुलन कैसे कायम होगा? इस विरोधाभासी संतुलन को माइक्रो-इरिगेशन अर्थात सूक्ष्म-कृषि के जरिए कायम किया जा सकता है।
माइक्रो-इरिगेशन क्या है?
भारत के कृषि क्षेत्र के मात्र आधे हिस्से में ही सिंचाई की सुविधा है। फिर भी, पुरानी एवं अक्षम बाढ़ सिंचाई विधियों के प्रमुखता से उपयोग का अर्थ है कि पानी के रिसाव, टपकाव एवं वाष्पीकरण के चलते काफी मात्रा में पानी का नुकसान होता है। दरअसल, बाढ़ सिंचाई में प्रयुक्त एक-तिहाई से कम पानी का ही लाभ सीधे फसलों को मिल पाता है, बाकी पानी यूं ही बर्बाद हो जाता है।
सूक्ष्म-सिंचाई का उपयोग करने पर पानी की इस तरह की बर्बादी नहीं होती है, पानी का बेहतर उपयोग हो पाता है, कृषि उत्पादकता बढ़ती है और उससे समृद्धि बढ़ती है।
भारत में प्राथमिक रूप से दो प्रमुख सूक्ष्म-सिंचाई पद्धतियों को अपनाया जाता है - ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंक्लर इरिगेशन। ड्रिप इरिगेशन में फसल की जड़ तक सीधे पानी पहुंचाने के लिए पाइप्स के नेटवर्क का उपयोग किया जाता है, जबकि स्प्रिंक्लर पद्धति में बारिश के रूप में पानी का छिड़काव किया जाता है और कृषि क्षेत्र के एक भू-खण्ड की सिंचाई की जाती है।
सिंचाई की पद्धति का निर्धारण विभिन्न फसलों और उनकी भिन्न-भिन्न जल आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। हालांकि, स्प्रिंक्लर इरिगेशन की तुलना में ड्रिप इरिगेशन स्वाभाविक रूप से अधिक सक्षम पद्धति है। स्प्रिंक्लर इरिगेशन में वाष्पीकरण के चलते पानी का नुकसान होता है। बाढ़ से सिंचाई की जाने वाली परंपरागत विधि की तुलना में, दोनों ही विधियां अत्यधिक लाभदायक हैं।
नीचे दी गई तालिका में परंपरागत बाढ़-सिंचाई की तुलना में सूक्ष्म-सिंचाई को अपनाने के परिणामी ठोस लाभों के बारे में रेखांकित किया गया हैः

मानदंड       बाढ़ सिंचाई की तुलना में लाभ
पानी की बचत     30% . 40%
उत्पादकता में वृद्धि     10%- 30%
बिजली के उपयोग में कमी                     20- 40%
श्रम आवश्यकता में कमी                                 30- 50%
उर्वरक और पोषण खपत में कमी     30%

जैसा कि तालिका से पता चलता है कि माइक्रो-इरिगेशन से न केवल पानी की बचत होती है और पानी के उपयोग की क्षमता बढ़ती है, बल्कि इससे किसान अपनी फसल की उत्पादकता एवं गुणवत्ता को भी बढ़ा सकते हैं व बेहतर बना सकते हैं। वे बिजली, उर्वरक एवं पोषक पदार्थों व आवश्यक श्रमबल के कम उपयोग के चलते लागत में कटौती कर सकते हैं।
उपरोक्त रेखांकित मात्रात्मक लाभों के अलावा, माइक्रो-इरिगेशन को अपनाने के कई अन्य लाभ भी हैं। माइक्रो-इरिगेशन से किसान को मानसून की अनिश्चितता की चिंता नहीं होगी। समय एवं आवश्यकता के अनुसार फसलों की पर्याप्त मात्रा में सिंचाई की जा सकती है, जिससे सिंचाई की अत्याधिकता से बचा जा सकेगा।
माइक्रो इरिगेशन से मिट्टी की गुणवत्ता बनाये रखने में भी मदद मिलती है - जबकि बाढ़ से की जाने वाली सिंचाई में पानी के साथ मिट्टी बह जाती है या मिट्टी खारी हो जाती है, जिससे मिट्टी को नुकसान पहुंचता है और यह एक समय के बाद बंजर हो जाती है। इसलिए, माइक्रो-इरिगेशन मिट्टी उर्वरता को बरकरार रखने में मदद करता है।
पानी पहुंचाने की लक्षित प्रकृति के चलते खर-पतवार भी न के बराबर उगते हैं और फसल बीमारियों से सुरक्षित रहती है। आगे, इसे असमतल या पहाड़ी भूभाग में उपयोेग में लाया जा सकता है, जिसके जरिए पहले से कृषि के लिए अनुपयुक्त भूमि भी बाद में कृषि योग्य हो जाती है।
अवसर
माइक्रो-इरिगेशन के उपयोग की संभावना अपार है। इसके स्पष्ट लाभों के बावजूद, माइक्रो-इरिगेशन विधि का उपयोग कम हो रहा है। अभी भी अधिकांश ऐसे किसान हैं जो परंपरागत एवं पुरानी बाढ़-सिंचाई विधि को उपयोग में लाते हैं।
अनुमानों के अनुसार, माइक्रो-इरिगेशन को भारत की 45-70 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि पर संभवतः उपयोग में लाया जा सकता है। वर्तमान में, उस संभावना का मात्र 7-10 प्रतिशत ही उपयोग हो सका है, लेकिन इस बारे में बढ़ती जागरूकता एवं तकनीक को समर्थन देने हेतु किये जा रहे सरकारी प्रयासों के चलते, माइक्रो-इरिगेशन को जल्द ही बड़े पैमाने पर उपयोग में लाया जाने लगेगा।
माइक्रो-इरिगेशन के अवसर एवं लाभ को नीतिनिर्माता भी समर्थन दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र सरकार - जिनकी शासकीय सीमांतर्गत मराठवाड़ा स्थित है - अगले तीन वर्षों में पानी की अधिक आवश्यकता वाली गन्ना जैसी फसलों के लिए ड्रिप इरिगेशन को प्रयोग में लाने हेतु महत्वपूर्ण रूप से प्रोत्साहन दे रही है।
कंपनियां और व्यावसायिक घराने भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। मैं इस क्षेत्र में दूसरों के बारे में तो नहीं बता सकता, लेकिन हमारा ईपीसी बिजनेस भारत में माइक्रो-इरिगेशन के मामले में अग्रणी भूमिका निभाने वालों में शामिल है। ड्रिप एवं स्प्रिंक्लर-इरिगेशन सिस्टम्स जैसे हमारे प्रोडक्ट्स इस दिशा में किसानों की मदद कर रहे हैं, हमें किसानों को सस्ती तकनीक से लैस कर फार्म प्रॉस्पेरिटी को बढ़ाने के हमारे सपने के करीब ले जा रहे हैं।
सरकार और उद्योग के संयुक्त प्रयास से जागरूकता की कमी दूर करने में मदद मिल रही है और इसकी लागत को लेकर फैली गलतफहमियां दूर हो रही हैं। इसका उपयोग बढ़ रहा है।
हमें इस संगठित प्रयास को बनाये रखना होगा। समय अभी भी हमारे साथ है। हमें सूखी कृषि भूमि को वापस उपजाऊ भूमि के रूप में बदलना होगा। हमारा भविष्य इसी पर निर्भर है।
अशोक शर्मा
प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, महिंद्रा एग्री सॉल्यूशंस लिमिटेड

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